सत्य न्याय के पथ पर चलना, शिक्षक हमें बताते हैं…जीवन संघर्षों से लड़ना, शिक्षक हमें सिखाते हैं

टीचर्स डे: जब राधाकृष्‍णन की हाजिर जवाबी देखकर चुप्पी साध लेते थे गांधी

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस को हम शिक्षक दिवस के माध्यम से जानते हैं। हर साल 5 सितंबर को धूम-धाम से हम शिक्षक दिवस मनाते हैं। असल में पांच सितंबर 1888 उनका जन्मदिन है। भारतीय संस्कृति में पूर्ण आस्था रखने वाले देश के दूसरे राष्ट्रपति राधाकृष्णन महान दार्शनिक थे। उनकी ख्याति देश दुनिया में थी। डॉ. राधाकृष्णन ही थे जिन्होंने कोलकाता, काशी और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का कार्य एक साथ देखा ही नहीं बल्कि अपनी विद्वता, प्रशासन-क्षमता और अद्भुत सूझ-बूझ के बल पर उन्होंनें अपना कार्य सफलतापूर्वक संपन्न भी किया।

क्या कहा था अंग्रेजों को?

डॉ राधाकृष्णन तर्कपूर्ण हाजिर-जवाबी की दुनिया कायल थी। एक बार वे भारतीय दर्शन पर व्याख्यान देने के लिए इंग्लैंड गए। वहां बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आए थे, तभी एक अंग्रेज ने उनसे पूछा कि क्या हिंदू नाम का कोई समाज है? कोई संस्कृति है? तुम कितने बिखरे हुए हो? तुम्हारा एक सा रंग नहीं- कोई गोरा तो कोई काला, कोई धोती पहनता है तो कोई लुंगी, कोई कुर्ता तो कोई कमीज। देखो हम सभी अंग्रेज एक जैसे हैं- एक ही रंग और एक जैसा पहनावा।

राधाकृष्णन ने उस अंग्रेज को जवाब दिया था- घोड़े अलग-अलग रूप-रंग के होते हैं, पर गधे एक जैसे होते हैं। अलग- अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं।

गांधी जी से क्या कहा था राधाकृष्णन ने?

सन 1938 में डॉ राधाकृष्णन सेवाग्राम में गांधी जी से मिलने पहुंचे। गांधी जी उस समय देशवासियों से मूंगफली खाने पर जोर दे रहे थे। वे लोगों को दूध पीने से मना किया करते थे। उनका मानना था कि दूध गाय के मांस का ही अतिरिक्त उत्पादन है।
डॉ. राधाकृष्णन जब गांधी जी से मिलने पहुंचे तो गांधी जी ने डॉक्टर साहब से ये बातें कहीं। डॉ. राधाकृष्णन का जवाब था- तब तो हमें मां का दूध भी नहीं पीना चाहिए।